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सूतक काल में पगड़ी -रस्म के दिन समाज के लोगों को भोजन कराना -कुप्रथा

सिन्धी समाज में पगड़ी-रस्म की अदायगी क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है

सूतक काल में पगड़ी -रस्म के दिन समाज के लोगों को भोजन कराना -कुप्रथा

सिन्धी समाज में पगड़ी-रस्म की अदायगी क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है

*सिंधी समाज में पगड़ी-रस्म एक सामाजिक रस्म है जिसमें समाज के लोग शोकाकुल परिवार को सांत्वना देने के साथ ही उस क्षण के साक्षी होते हैं जब घर की नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी जाती है।*
*सिन्धी समाज में किसी भी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर अंतिम संस्कार के तीसरे दिन पगड़ी-रस्म अदा की जाती है इसका कारण यह है कि जिस परिवार में शोक (गमी) हो जाती है तो उस शोकाकुल परिवार के पुरुष सदस्य शोक स्वरुप दो दिन सिर पर कुछ नही पहनते है, पुराने जमाने में सिन्धी समाज में सिर पर पगड़ी बांधने को सम्मानजनक माना जाता था और इसलिए सिन्धी समाज के पुरुष सद्स्यों द्वारा सिर पर पगड़ी बांधने का रिवाज था।*
*दो दिनों के बाद तीसरे दिन पगड़ी-रस्म में सिन्धी समाज के कुल ब्राम्हण (पंडित) जी द्वारा मंत्रोच्चार के मध्य चारों कांधियों (शव को कंधा देने वाले प्रथम चार लोग) को पगड़ी बांधी जाती है। उसके बाद चारों कांधियों को जल (पानी) भरकर लाने कहा जाता था। फिर कांधियों द्वारा जल (पानी) भरकर लाने के बाद पगड़ी-रस्म में शामिल होने आए सामाजिक सदस्यों के साथ चारों कांधियों को चारों दिशाओं में बिठाया जाता था और चारों कांधियों द्वारा लाए गए उस जल (पानी) का छिड़काव उपस्थित समस्त जनसमूह पर किया जाता था। वर्तमान समय में आंशिक रुप से कुछ परिवर्तन करते हुए जल (पानी) पूर्व में ही एक जग रुपी पात्र में भरकर रख लिया जाता है और उसी जल (पानी) से लोटा भर कर उपस्थित जनसमूह पर छिड़काव किया जाता है। पगड़ी रस्म में उपस्थित समस्त जनसमूह पर जल का छिड़काव इसलिए किया जाता है, क्योंकि सिन्धी समाज के आराध्य देव भगवान श्री झूलेलाल साँई जी की उत्पत्ति जल में से हुई थी। भगवान श्री झूलेलाल साँई जी को जल का देवता एवं श्री वरुणदेव का अवतार माना जाता है। जल के छिड़काव का उद्द़ेश्य उपस्थित समस्त जनसमुदाय के सुख-शांति परिवार की कुशलता एवं मंगल कामना बाबत् किया जाता है।*
*चारों कांधियों को सामाजिक सदस्यों के सानिध्य में बिठाने का कारण यह रहता था कि अब कांधियों को तीन दिनों से बंद अपने व्यवसाय रोजगार स्थल पर जल का छिड़काव कर दीप धूप अगरबत्ती इत्यादि जलाकर कार्य स्थल को शुद्ध किया जाता है। तथा *पगड़ी-रस्म पश्च़ात चारों कांधियों सहित शोकाकुल परिवार के सदस्यों का अन्य सामाजिक सदस्यों के घर आने जाने का प्रतिबंध समाप्त माना जाए। मतलब यह कि अब सर्वप्रथम शव को कांधा देने वाले चारों सदस्य समाज मेंं सभी के साथ उठ बैठ सकते है। इस पगड़ी-रस्म में शामिल होने आए सामाजिक सदस्यों द्वारा एक प्रकार से दिवंगत को श्रद्धांजलि अर्पित करने वाली शोक सभा रहती है।*
*हालांकि कांधियों सहित परिवार के सदस्यों पर *बारहवां होने तक जमीन पर सोने और ब्रम्हचर्य का पालन करने का प्रतिबंध जारी रहता है, जो बारहवीं के दिन पंडित जी द्वारा पूजा-अर्चना एवं हवन इत्यादि धार्मिक अनुष्ठान के पश्च़ात तथा संध्या लगभग 4 से 5 बजे के बीच समाज के पूज्य पंचगणों द्वारा चारों कांधियों को *तखत या खाट पर बिठाया जाता है और चारों कांधियों सहित परिवार के सदस्यों को कच्चा दूध पिलाने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है और सूर्यास्त के पूर्व दाढ़ी बनवाने हेतु निर्देशित किया जाता है।*

*वर्तमान बदलते परिवेश में अंधाधुंध आधुनिकीकरण के प्रभाव के चलते सिन्धी समाज में एक नई कुरीति ने अपना स्थान बना लिया है और वह कुरीति है अपने रिश्तेदारों, ईष्ट मित्रों, पड़ोसियों, परिवार और समाज के सदस्यों को *पगड़ी-रस्म के ही दिन भोजन कराकर बारहवें के दिन किये जाने वाले *भोज से मुक्ति पाना..जबकि हमारे सिन्धी समाज की जो परंपरा और धार्मिक मान्यतानुसार परिवार में किसी भी सदस्य के निधन होने के समय से बारहवीं तक सूतक काल लगा रहता है। ऐसी परिस्थितियों में होना तो यह चाहिए कि जब तक बारहवीं की पूजा अर्चना ना हो जाये और ब्राम्हण यानी कि महाराज स्वामी जी (पंडित जी) भोजन ग्रहण ना कर लेवें तब तक ना घर की शुद्धि होना माना जाता है और ना ही सामाजिक भोज करवाना ही उचित माना गया है।*
*सिन्धी समाज एक व्यवसायी समाज है और वर्तमान बदलते परिवेश में एकल परिवारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी हो रही है। समाज में इस कुरीति पर चर्चा करने पर इसी बात का हवाला देकर बार-बार आने-जाने से व्यापार में होने वाले नुक़सान तथा समय की बचत का हवाला दिया जाता है। लेकिन फिर भी इस पर संज्ञान लिया जाकर समाज के प्रबुद्धजनों को इस कुरीति पर प्रतिबंध एवं सामाजिक नियमों के पालनार्थ उचित कार्यवाही की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए।*
*यह एक कुरीति के ऊपर ध्यानाकर्षण कर समाज को जागरुक करने की दिशा में एक विनम्र प्रयास है..इसे निंदा के रुप में ना लिया जाकर ग़लत प्रथा की दिशा में जा रहे समाज को जागृत करने एवँ समाज सुधार की दिशा में सुझाव के रुप में लिया जाना चाहिए.!*
*मेरा आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि मेरी यह पोस्ट किसी के विरोध में नहीं है बल्कि यह पोस्ट सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की दिशा में लिखी गई है..इस पोस्ट का एकमात्र उद्देश्य समाज को जागरुक करना है कृपया गलतियों को नजर अंदाज करें और भावनाओं को समझने का प्रयास करते हुए सिर्फ दिए गए सुझाव पर चर्चा करें, मनन करें।

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